
| श्रुतितति विहिते मुनिगण विदिते |
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रागं : नठभैरवि ताळं : आदि पल्लवि : श्रुतितति विहिते! मुनिगण विदिते! देवि! पाहि भावे विधृते! परशिव मिलिते! मम मतिरिह ते गेह मस्तु नित्यं ललिते! चरणं : भावे देवी भूयादेषा निवसतु मम सा वचसि च मुदिता एवमुमासति! मे परिदेवन मोंकुरु सादर मीशविलासिनि! …1 सर्वाधारे! सर्वाकारे! विगलित कलुषे! श्रितपरपुरुषे! श्रीनठभैरवि राग विनोदिनि! श्रीनटभामिनि! सच्चिदानंदिनि! …2 |